इड़ा नाड़ी के माध्यम से वायु को शनैः शनैः अन्दर की ओर खाँचकर के उदर में धारण करें, उस (पूरक) काल में सोलह मात्राओं का प्रयोग करें और श्रेष्ठ अकार का ध्यान करें।
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