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जाबाल दर्शन • अध्याय 6 • श्लोक 3
इडया वायुमाकृष्य पूरयित्वोदरे स्थितम्। शनैः षोडशभिर्मात्रैरकारं तत्र संस्मरेत् ॥
इड़ा नाड़ी के माध्यम से वायु को शनैः शनैः अन्दर की ओर खाँचकर के उदर में धारण करें, उस (पूरक) काल में सोलह मात्राओं का प्रयोग करें और श्रेष्ठ अकार का ध्यान करें।
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