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जाबाल दर्शन • अध्याय 6 • श्लोक 11
वत्सराद्ब्रह्मविद्वान्नस्यात्तस्मान्नित्यं समभ्यसेत्। योगाभ्यासरतो नित्यं स्वधर्मनिरतश्च यः ॥
एक वर्ष तक लगातार ऊपर कही हुई विधि से प्राणायाम करने से साधक को अविनाशी ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है। अतः प्राणायाम का नित्य ही अभ्यास किया जाना चाहिए। जो पुरुष योग के अभ्यास में संलग्न रहकर सदैव अपने धर्म के पालन में लगा रहता है।
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