पुनः पिङ्गलयापूर्य वह्निबीजमनुस्मरेत् । पुनर्विरेचयेद्धीमानिडयैव शनैः शनैः त्रिचतुर्वासरं वाथ त्रिचतुर्वारमेव च । षट्कृत्वा विचरेन्नित्यं रहस्येवं त्रिसंधिषु ॥
फिर पिङ्गला नाड़ी के माध्यम से पहले की भाँति प्राणवायु को अपने अन्दर धारण करके अग्नि-बीज का चिन्तन करना चाहिए। इसके बाद इड़ा नाड़ी के द्वारा फिर उसे शनैः शनैः बाहर निकाल देना चाहिए। इस तरह से इस प्रक्रिया द्वारा एकान्त में लगातार तीन-चार दिनों तक अथवा प्रतिदिन त्रिकाल समय की संध्याओं में तीन चार अथवा छः बार यह क्रिया करनी चाहिए।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
जाबाल दर्शन के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
जाबाल दर्शन के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।