इसके पश्चात् प्रणव के बिन्दु एवं नाद से संयुक्त होकर अग्नि-बीज (रं) का चिन्तन करना चाहिए। इसके बाद श्रेष्ठ साधक पिङ्गला नाड़ी (अर्थात् नासिका के दक्षिण छिद्र के द्वारा) प्राणवायु को विधिपूर्वक धीरे-धीरे बहिर्गमन करे।
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