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जाबाल दर्शन • अध्याय 5 • श्लोक 4
पर्वताग्रे नदीतीरे बिल्वमूले वनेऽथवा । मनोरमे शुचौ देशे मठं कृत्वा समाहितः ॥
तदनन्तर पर्वत शिखर, नदी-तट, बिल्व वृक्ष के पास में, एकान्त वन अथवा और अन्य किसी पवित्र एवं सुन्दर प्रदेश में आश्रम का निर्माण कर चित को एकाग्र करके वहाँ निवास करे।
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