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जाबाल दर्शन • अध्याय 5 • श्लोक 13
अज्ञानान्मलिनो भाति ज्ञानाच्छ्रुद्धो विभात्ययम्। अज्ञानमलपङ्कं यः क्षालयेज्ज्ञानतोयतः । स एव सर्वदा शुद्धो नान्यः कर्मरतो हि सः ॥
अज्ञानता के कारण ही आत्मा में मलिनता प्रतीत होती है। ज्ञान होने पर यह सदैव विशुद्ध रूप से प्रकाशित होने लगता है, जो मनुष्य अज्ञानरूपी मल एवं कीचड़ को ज्ञानरूपी जल से धो डालता है, वही मनुष्य परम पवित्र है; जो मनुष्य ज्ञान की उपेक्षा करके लौकिक कर्मों में आसक्त रहता है, वह पवित्र नहीं है।
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