अथवैतत्परित्यज्य स्वात्मशुद्धिं समाचरेत्। आत्मा शुद्धः सदा नित्यः सुखरूपः स्वयम्प्रभः ॥
अथवा इन सभी का परित्याग करके मात्र आत्मा की शुद्धि का ही अनुष्ठान करना चाहिए। यह आत्मा सदैव पवित्र, नित्य, सुखरूप एवं स्वप्रकाशित है।
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