इस क्रिया से उस (साधक) की नाड़ी पवित्र हो जाती है और इस नाड़ी शुद्धि के पृथक् चिह्न भी दृष्टिगोचर होने लगते हैं। शरीर हल्का हो जाता है, जठराग्रि तीव्र हो उठती है और
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