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जाबाल दर्शन • अध्याय 5 • श्लोक 1
सम्यक्कथय मे ब्रह्मन्नाडीशुद्धिं समासतः। यथा शुद्धा सदा ध्यायञ्जीवन्मुक्तो भवाम्य-हम् ॥
साङ्कृति ने भगवान् दत्तात्रेय जी से पुनः प्रश्न किया - 'हे ब्रह्मन्! नाड़ी शोधन की क्या प्रक्रिया है, यह मुझे ठीक तरह से एवं अति संक्षेप में बताइये, जिससे कि मैं नाड़ी शुद्धिपूर्वक सदा ही परमात्मतत्त्व का ध्यान करते हुए इस जीवन से मुक्ति प्राप्त कर सकूं'।
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