ब्रह्मादिलोकपर्यन्ताद्विरक्त्या यल्लभेत्प्रियम्। सर्वत्र विगतस्त्रेहः संतोषं परमं विदुः । श्रौते स्मार्ते च विश्वासो यत्तदास्तिक्यमुच्यते ॥
सर्वत्र अनासक्त रहकर ब्रह्मा आदि देवताओं के लोक तक के सुखों से विरक्त होने के कारण मन में जो प्रसन्नता बनी रहती है, महान् पुरुष उसी को श्रेष्ठ संतोष मानते हैं। वेदों एवं स्मृति-ग्रन्थों में कहे हुए धर्म में दृढ़ आत्मविश्वास होने को ही 'आस्तिकता' कहते हैं।
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