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जाबाल दर्शन • अध्याय 2 • श्लोक 15
उच्चैर्जपादुपांशुश्च सहस्त्रगुणमुच्यते । मानसश्च तथोपांशोंः सहस्त्रगुणमुच्यते उच्चैर्जपश्च सर्वेषां यथोक्तफलदो भवेत्। नीचैः श्रोत्रेण चेन्मन्त्रः श्रुतश्चेत्रिष्फलं भवेत् ॥
'उच्च' अर्थात् ऊँचे स्वर से किये जाने वाले जप की अपेक्षा 'उपांशु' अर्थात् फुसफुसाकर किया गया जप सहस्रगुना श्रेष्ठ कहा गया है। इसी तरह, उपांशु की अपेक्षा मानसिक जप सहस्त्रगुना अधिक उत्तम कहा गया है। उच्च स्वर से सम्पन्न किया गया जप सभी लोगों को भली-भाँति फल प्रदान करने वाला होता है, किन्तु यदि उस मन्त्र को निम्न स्तर के व्यक्तियों ने श्रवण कर लिया, तो वह व्यर्थ हो जाता है।
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