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जाबाल दर्शन • अध्याय 10 • श्लोक 9
यदा मनसि चैतन्यं भाति सर्वत्रगं सदा। योगिनोऽव्यवधानेन तदा संपद्यते स्वयम् ॥
जिस समय योगी के मन में सर्वत्र व्यापक आत्म चैतन्यस्वरूप का अपरोक्ष रूप में अनुभव होने लगता है, तब उस समय वह स्वयं ही परमात्मस्वरूप में स्थापित हो जाता है।
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