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जाबाल दर्शन • अध्याय 10 • श्लोक 7
समुद्रे लीयते तद्वज्जगन्मय्यनुलीयते। तस्मान्मनः पृथङ्नास्ति जगन्माया च नास्ति हि ॥
इसलिए सृष्टि का कारणभूत मन भी मुझसे पृथक् नहीं है। इस जगत् और माया का भी मुझसे भित्र अस्तित्व नहीं है।
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