यह आत्मा अविनाशी, नित्य, सर्वव्यापी, एकरस एवं सर्वदोषहीन है। यह एक होते हुए भी माया द्वारा उत्पन्न हुए भ्रम के कारण इसकी पृथक् पृथक् प्रतीति होती है। यथार्थ में उसमें कोई भी भेद नहीं है।
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