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जाबाल दर्शन • अध्याय 10 • श्लोक 12
यदा पश्यति चात्मानं केवलं परमार्थतः। मायामात्रं जगत्कृत्स्नं तदा भवति निर्वृतिः ॥
जब पुरुष केवल अपनी आत्मा को ही परमार्थ सत्यस्वरूप में देखता है, सम्पूर्ण विश्व को माया का विलास मात्र मानता है, तब वह परमानन्द को प्राप्त कर लेता है।
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