ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः । न चास्ति किंचित्कर्तव्यमस्ति चेन्न स तत्त्ववित् ॥
जो योगी ज्ञानरूप अमृत से तृप्त एवं कृतार्थ हो जाता है, उसके लिए इस जगत् में कोई भी कर्तव्य शेष नहीं रहता है और यदि रह जाता है, तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है।
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