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जाबाल दर्शन • अध्याय 1 • श्लोक 22
ज्ञानशौचं परित्यज्य बाहो यो रमते नरः। स मूढः काञ्चनं त्यक्त्वा लोष्टं गृह्णाति सुव्रत ॥
हे श्रेष्ठव्रती मुने! ज्ञानरूप पवित्रता को भुलाकर जो साधक केवल बाहरी पवित्रता में ही रमा रहता है, वह सुवर्ण का त्याग करके मिट्टी के ढेलों का संग्रह करने वाले मूर्ख की ही भाँति है।
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