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जाबाल दर्शन • अध्याय 1 • श्लोक 20
स्वदेहमलनिर्मोक्षो मृजलाभ्यां महामुने। यत्तच्छौचं भवेद्वाह्यं मानसं मननं विदुः । अहं शुद्ध इति ज्ञानं शौचमाहुर्मनीषिणः ॥
हे महामुने! अपने शरीर के मल को मिट्टी एवं जल से परिमार्जित किया जाता है, इस कृत्य को 'बाड़ा शौच' कहते हैं और मन के माध्यम से श्रेष्ठ, पवित्र भावों का जो चिन्तन-मनन किया जाता है, उसे 'मानसिक शौच' कहा गया है। इसके अतिरिक्त विद्वज्जन 'मैं विशुद्ध आत्मा हूँ,' इस श्रेष्ठ ज्ञान को ही शौच कहते हैं।
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