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जाबाल दर्शन • अध्याय 1 • श्लोक 19
अल्पमृष्टाशनाभ्यां च चतुर्थांशावशेषकम् । तस्माद्योगानुगुण्येन भोजनं मितभोजनम् ॥
अल्प मात्रा में शुद्ध सात्त्विक भोजन ग्रहण करना, पेट के दो भाग भोजन से, तृतीय भाग को जल से तथा चौथे भाग को वायु के लिए खाली छोड़ना ही योगमार्ग के अनुकूल भोजन है, वही मिताहार कहलाता है।
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