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जाबाल दर्शन • अध्याय 1 • श्लोक 18
वेदादेव विनिर्मोक्षः संसारस्य न चान्यथा । इति विज्ञाननिष्पत्तिधृतिः प्रोक्ता हि वैदिकैः । अहमात्मा न चान्योऽस्मीत्येवमप्रच्युता मतिः ॥
वेद-ज्ञान से ही सम्पूर्ण जगत् मोक्ष को प्राप्त होता है और अन्य किन्हीं भी कारणों से नहीं। ऐसा जो दृढ़ संकल्प है, उसी को ही वेदज्ञों ने धृति की उपाधि प्रदान की है या फिर 'मैं आत्मा हूँ,' आत्मा से पृथक् दूसरा और कुछ भी नहीं हूँ। इस प्रकार से कभी भी विचलित न होने वाली बुद्धि ही श्रेष्ठ उत्तम 'धृति' है।
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