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जाबाल दर्शन • अध्याय 1 • श्लोक 17
कायेन मनसा वाचा शत्रुभिः परिपीडिते । बुद्धिक्षोभनिवृत्तिर्या क्षमा सा मुनिपुङ्गव ॥
हे श्रेष्ठ मुने! रिपुओं के द्वारा मन, वचन एवं शरीर से कष्ट दिये जाने पर भी बुद्धि में थोड़ा भी क्षोभ न आने देना ही 'क्षमा' कहलाता है।
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