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जाबाल दर्शन • अध्याय 1 • श्लोक 15
स्वात्मवत्सर्वभूतेषु कायेन मनसा गिरा। अनुज्ञा या दया सैव प्रोक्ता वेदान्तवेदिभिः ॥
समस्त भूतप्राणियों को अपनी ही भाँति जानकर उनके प्रति मन, वचन एवं शरीर द्वारा आत्मीयता का अंनुभव करना (अर्थात् अपनी ही तरह उनके दुखों को दूर करने तथा अधिक से अधिक सुख पहुँचाने का प्रयास करना) ही वेदवेत्ता विद्धजनों के द्वारा 'दया' बताई गयी है।
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