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ईश • अध्याय 1 • श्लोक 8
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्‌। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान्‌ व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥
वह परमात्मा सर्वव्यापक, स्वप्रकाश, शरीररहित, व्रणरहित, स्नायु आदि अवयवों से रहित, शुद्ध और पाप से सर्वथा अछूता है। वह सर्वद्रष्टा (कवि), सर्वज्ञ मनीषी, सबसे श्रेष्ठ (परिभू) और स्वयंसिद्ध (स्वयम्भू) है। उसी ने यथार्थ रूप से समस्त पदार्थों और उनके कार्यों का शाश्वत काल के लिए विधान किया है।
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