वह एकमात्र परमात्माअचल है, फिर भी मन से भी अधिक वेगवान है। इन्द्रियाँ(देव) उसे प्राप्त नहीं कर सकतीं, क्योंकि वह उनसे पहले ही पहुँच चुका होता है। वह स्थिर रहकर भी दौड़ने वालों को अतिक्रमित कर जाता है। उसी में मातरिश्वा(वायु अथवा प्राणशक्ति) समस्त क्रियाओं और शक्तियों को धारण करता है।
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