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ईश • अध्याय 1 • श्लोक 4
अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्‌। तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥
वह एकमात्र परमात्मा अचल है, फिर भी मन से भी अधिक वेगवान है। इन्द्रियाँ (देव) उसे प्राप्त नहीं कर सकतीं, क्योंकि वह उनसे पहले ही पहुँच चुका होता है। वह स्थिर रहकर भी दौड़ने वालों को अतिक्रमित कर जाता है। उसी में मातरिश्वा (वायु अथवा प्राणशक्ति) समस्त क्रियाओं और शक्तियों को धारण करता है।
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