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ईश • अध्याय 1 • श्लोक 2
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥
मनुष्य यहाँ (इस संसार में) कर्म करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करे। इस प्रकार (कर्म करते हुए) तुम्हारे लिए यही मार्ग है, अन्य कोई नहीं; इससे कर्म मनुष्य को बाँधता नहीं है।
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