कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥
मनुष्य को इस संसार में कर्म करते हुए हीसौ वर्ष तक जीवित रहने की इच्छा करनी चाहिए। तेरे लिए यही मार्ग है, अन्य कोई नहीं; क्योंकि इस प्रकार कर्म करते रहने पर कर्म मनुष्य को बन्धन में नहीं डालते।
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