जो पुरुष सम्भूति और विनाश—इन दोनों को एक साथ यथार्थ रूप से जानता है, वह विनाशशील(नश्वर जगत् अथवा कार्यरूप उपासना) के ज्ञान द्वारा मृत्यु(संसारबन्धन) को पार करता है और सम्भूति(कार्यब्रह्म अथवा ईश्वर-उपासना) के द्वारा अमृतत्व को प्राप्त करता है।
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