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हितोपदेश • अध्याय 5 • श्लोक 9
तच्छ्रुत्वा सेवकेन प्रकुप्योक्तं -- यस्य स्वामिनो गृह एतादृशी भार्या तत्र सेवकेन कथं स्थातव्यम् यत्र च प्रतिक्षणं गृहिणी सेवकस्य मुखं जिघ्रति । ततोऽसावुत्थाय चलितः । साधुना यत्नात्प्रबोध्य धृतः । अतोऽहं ब्रवीमि -- उत्पन्नामापदम् इत्यादि । ततो यद्भविष्येणोक्तम् -- ०८८ यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तद् अन्यथा । इति चिन्ताविषघ्नोऽयमगदः किं न पीयते ॥
(स्त्री की) बातें सुनकर नौकर ने क्रोधित होकर कहा - जिस घर की पत्नी ऐसी हो, जिसकी मालकिन को हर पल नौकर के मुँह से बदबू आती हो, उस मालिक के घर में कौन रह सकता है? यह कह कर वह उठा और चल दिया। व्यापारी ने बड़ी कठिनाई से उसे मनाया और अपनी सेवा में रख लिया। इसलिए मैं कहता हूं-वह वास्तव में प्रतिभाशाली है जो प्रतिकार करता है। इसके बाद यद्भविष्य ने कहा - जो नहीं होना है वह कभी नहीं हो सकता और जो होना है वह कभी अन्यथा नहीं हो सकता। चिंता के जहर को ख़त्म करने वाली ये दवा क्यों नहीं पी जाती?
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