यद्भविष्यः पृच्छति -- कथमेतत् ।
प्रत्युत्पन्नमतिराह --
॥ कथा ३ ॥
अस्ति विक्रमपुरे समुद्रदत्तो नाम वणिक् । तस्य
रत्नप्रभा नाम वधूः केनापि स्वसेवकेन सह सदा रमते । यतः ।
न स्त्रीणामप्रियः कश्चित् प्रियो वापि न विद्यते ।
गावस्तृणमिवारण्ये प्रार्थयन्ति नवं नवम् ॥
यद्भविष्य ने पूछा कैसे? प्रत्युतपन्नमति ने कहा - विक्रमपुर में समुद्रदत्त नाम का एक व्यापारी था। उसकी पत्नी, जिसका नाम रत्नप्रभा था, सदैव अपने एक नौकर के साथ विहार करती थी। क्योंकि स्त्रियों को न तो कोई अप्रिय लगता है और न कोई उन्हें प्रिय लगता है; लेकिन वे हमेशा नई की चाहत रखती हैं, जैसे गायें जंगल में ताज़ी घास की तलाश में रहती हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
हितोपदेश के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
हितोपदेश के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।