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हितोपदेश • अध्याय 5 • श्लोक 66
तथा चोक्तम् -- स्कन्धेनापि वहेच्छत्रून्कार्यमासाद्य बुद्धिमान् । यथा वृद्धेन सर्पेण मण्डूका विनिपातिताः ॥
पुनः कहा गया है - किसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बुद्धिमान व्यक्ति को अपने शत्रुओं को भी अपने कंधे पर उठाना चाहिए, जैसे (ऐसा करने से) बूढ़े सर्प ने मेंढ़कों को नष्ट कर दिया था।
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