मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
हितोपदेश • अध्याय 5 • श्लोक 48
सम्पत्तेश्च विपत्तेश्च दैवमेव हि कारणम् । इति दैवपरो ध्यायन्नात्मानमपि चेष्टते ॥
वास्तव में, भाग्य ही समृद्धि या विपत्ति का एकमात्र कारण है। जो भाग्य पर निर्भर रहकर ऐसा सोचता रहता है, वह अपने लिये भी नहीं हिलता।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
हितोपदेश के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

हितोपदेश के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें