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हितोपदेश • अध्याय 5 • श्लोक 43
भीरुर्युद्धपरित्यागात्स्वयमेव प्रणश्यति । तथैव भीरुपुरुषः सङ्ग्रामे तैर्विमुच्यते ॥
जिसके लालची अनुयायी होते हैं, वह शत्रुओं द्वारा दिए गए उपहारों से विमुख होने पर उनके द्वारा मार डाला जाता है।
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