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हितोपदेश • अध्याय 5 • श्लोक 138
तन्मम संमतेन तदेव क्रियताम् । यतः । अश्वमेधसहस्राणि सत्यं च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेवातिरिच्यते ॥
तो फिर मेरी राय के अनुसार वही (अच्छे का साथ) ही करने दो। क्योंकि, यदि एक हजार अश्व-यज्ञ और सत्य को (एक-दूसरे के विरुद्ध) तौला जाए, तो सत्य एक हजार अश्वमेधों से अधिक भारी होगा।
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