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हितोपदेश • अध्याय 5 • श्लोक 113
अदृष्टनर आदिष्ट आत्मादिष्ट उपग्रहः । परिक्रयस्तथोच्छन्नस्तथा च परभूषणः ॥
अदृष्टनार, अधिष्ठा, आत्मदिष्ट, उपग्रह, परिक्रय, उच्चान्न, पराभूषण और स्कंधोपनेय
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