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हितोपदेश • अध्याय 4 • श्लोक 38
राजा विमृश्योवाच -- प्राप्तस्तावन्मयोत्तमः प्रणिधिः । मन्त्री ब्रूते -- तदा सङ्ग्रामविजयोऽपि प्राप्तः । अत्रान्तरे प्रतीहारः प्रविश्य प्रणम्योवाच देव -- जम्बुद्वीपादागतो द्वारि शुकस्तिष्ठति । राजा चक्रवाकमालोकते । चक्रवाकेनोक्तम् -- कृतावासे तावद्गत्वा भवतु । पश्चादानीय द्रष्टव्यः । प्रतीहारस्तमावासस्थानं नीत्वा गतः । राजाह -- विग्रहस्तावदुपस्थितः । चक्रवाको ब्रूते -- देव तथापि सहसा विग्रहो न विधिः । यतः । सचिवः किं स मन्त्री वा य आदावेव भूपतिम् । युद्धोद्योगं स्वभूत्यागं निर्दिशत्यविचारितम् ॥
राजा ने विचार करके कहा - मुझे सबसे अच्छा दूत मिल गया है। मंत्री - तब तो युद्ध में भी सफलता मिलती है। तभी द्वारपाल ने प्रवेश करते हुए प्रणाम करके कहा - महाराज, जंबूद्वीप से आया एक तोता द्वार पर प्रतीक्षा कर रहा है। राजा ने चक्रवाक की ओर देखा। चक्रवाक ने कहा - पहले उसे उसके लिए तैयार किये गये निवास पर जाने दो और वहीं प्रतीक्षा करो। हम बाद में उसे बुलाएंगे और उसका साक्षात्कार लेंगे। द्वारपाल तोते को निवास स्थान पर ले गया और चला गया। राजा - जहाँ तक युद्ध की बात है तो यह आसन्न है। चक्रवाक - अभी भी एक साथ युद्ध में जाना कोई बुद्धिमानी की नीति नहीं है। क्योंकि, क्या वह सेवक या परामर्शदाता है, जो बिना उचित विचार किये अपने प्रभु को शुरू में ही युद्ध के लिए तैयार होने या अपनी भूमि छोड़ने की सलाह देता है?
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