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हितोपदेश • अध्याय 4 • श्लोक 37
पश्य । मन्त्रभेदेऽपि ये दोषा भवन्ति पृथिवीपतेः । न शक्यास्ते समाधातुमिति नीतिविदां मतम् ॥
देखो, राजा के मन्तव्य से जो अनिष्ट होता है, उसका निवारण नहीं हो पाता - ऐसा राजनीति में पारंगत लोगों का मत है।
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