राजाब्रवीत् -- भवतु कारणमत्र
पश्चान्निरूपणीयम् । सम्प्रति यत्कर्तव्यं तन् निरूप्यताम् ।
चक्रवाको ब्रूते -- देव प्रणिधिस्तावत्तत्र
यातु । ततस्तदनुष्ठानं बलाबलं च जानीमः । तथा हि ।
भवेत्स्वपरराष्ट्राणां कार्याकार्यावलोकने ।
चारश्चक्षुर्महीभर्तुर्यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥
राजा ने टिप्पणी की - जैसा भी हो। कारण की बाद में जांच की जा सकती है। अभी तो यह तय हो जाए कि हमें क्या कदम उठाने हैं। चक्रवाक-महाराज, पहले हमारे जासूस को वहां जाने दीजिए ताकि हमें उनकी हरकतों के साथ-साथ उनकी ताकत और कमजोरियों का भी पता चल सके। अपने राज्य या अपने शत्रुओं के संबंध में कौन सी नीति अपनानी है या क्या छोड़नी है, इसका निर्धारण करने में एक जासूस राजा की नजर होता है। जिसके पास यह नहीं है वह बिल्कुल अंधा है।
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