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हितोपदेश • अध्याय 4 • श्लोक 24
दुर्जनत्वं च भवतो वाक्यादेव ज्ञातम् । यदनयोर्भूपालयोर्विग्रहे भवद्वचनमेव निदानम् । पश्य । प्रत्यक्षेऽपि कृते दोषे मूर्खः सान्त्वेन तुष्यति । रथकारो निजां भार्यां सजारां शिरसाकरोत् ॥
जहाँ तक तेरी दुष्टता का प्रश्न है, वह तेरी वाणी से ही मालूम हो गया, क्योंकि तेरी वाणी ही इन दोनों राजाओं के बीच झगड़े का कारण है। देखो - मूर्ख, सुलह करने वाले शब्दों से प्रसन्न होता है, भले ही कोई अपराध उसकी आँखों के सामने किया गया हो। जैसा कि एक पहिये बनाने वाला था जिसने अपनी पत्नी को उसके प्रेमी के साथ अपने सिर पर ले लिया।
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