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हितोपदेश • अध्याय 4 • श्लोक 142
सारसो ब्रूते -- अन्यच्च देव शृणु । यदि समरमपास्य नास्ति मृत्योर्- भयमिति युक्तमितोऽन्यतः प्रयातुम् । अथ मरणमवश्यमेव जन्तोः किमिति मुधा मलिनं यशः क्रियेत ॥
सरस ने कहा - महाराज, मेरी बात फिर सुनो। यदि लड़ाई टालने के बाद मृत्यु का भय नहीं रह सकता तो यहां से चले जाना ही उचित होगा। लेकिन यदि मृत्यु किसी प्राणी के लिए अपरिहार्य है, तो प्रतिष्ठा को व्यर्थ क्यों धूमिल किया जाना चाहिए?
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