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हितोपदेश • अध्याय 4 • श्लोक 120
इत्याहमपि तूष्णीं स्थितः । अथ राजा बद्धाञ्जलिराह -- तात अस्त्वयं ममापराधः । इदानीं यथाहमवशिष्टबलसहितः प्रत्यावृत्य विन्ध्याचलं गच्छामि तथोपदिश । गृध्रः स्वगतं चिन्तयति -- क्रियतामत्र प्रतीकारः । यतः । देवतासु गुरौ गोषु राजसु ब्राह्मणेषु च । नियन्तव्यः सदा कोपो बालवृद्धातुरेषु च ॥
इस कारण मैं भी चुप रहा। इस पर राजा ने हाथ जोड़कर कहा - महाराज, यह दोष मेरा ही माना जाय। अब आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये कि मैं अपनी बची हुई सेना को लेकर विन्ध्य पर्वत पर लौट जाऊँ। गिद्ध ने मन ही मन कहा - इसका उपाय तो करना ही पड़ेगा। क्योंकि देवताओं, गुरु, गौओं, राजाओं, ब्राह्मणों तथा बालकों, बूढ़ों तथा रोगी व्यक्तियों के मामले में क्रोध पर सदैव संयम रखना चाहिए।
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