ततो मयाप्यालोचितम् -- प्रज्ञाहीनोऽयं राजा । न चेत्कथं
नीतिशास्त्रकथाकौमुदीं वागुल्काभिस्तिमिरयति । यतः ।
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥
तब मैंने भी मन में सोचा - यह राजा भेदभाव में डूबा हुआ है। अन्यथा, वह (मूर्खतापूर्ण) भाषणों की ज्वलनशील तेजतर्रारता के साथ राजनीति विज्ञान के परामर्शों की चांदनी को कैसे अस्पष्ट कर सकता है? क्योंकि, जो स्वयं प्रतिभा की चाह रखता हो, विज्ञान उसका क्या भला कर सकता है? जिसके आँखें ही न हों, उसके लिये दीपक किस काम का?
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