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हितोपदेश • अध्याय 4 • श्लोक 111
अन्यच्च । अवस्कन्दभयाद्राजा प्रजागरकृतश्रमम् । दिवासुप्तं समाहन्यान्निद्राव्याकुलसैनिकम् ॥ १११॥ अतस्तस्य प्रमादिनो बलं गत्वा यथावकाशं दिवानिशं घ्नन्त्वस्मत्सेनापतयः ।
इस कारण हमारे सेनापति दिन-रात उस लापरवाह (शाब्दिक भूल करने वाले) राजा की शक्ति को अवसर के अनुसार नष्ट करते रहें।
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