मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
हितोपदेश • अध्याय 3 • श्लोक 64
दमनको ब्रूते -- मित्र मा भैषीः । नाहमप्राप्तावसरं वचनं वदिष्यामि । यतः । आपद्युन्मार्गगमने कार्यकालात्ययेषु च । अपृष्टेनापि वक्तव्यं भृत्येन हितमिच्छता ॥
दमनक ने कहा - मित्र, डरो मत। मैं बेमौसम नहीं बोलूंगा क्योंकि, जब सेवक अपने स्वामी के हित को ध्यान में रखता है तो उसे बिना पूछे ही बोलना चाहिए, जब कोई विपत्ति आने वाली हो, जब स्वामी भटक रहा हो या जब किसी काम को करने का उचित समय निकल रहा हो (जब उसके स्वामी ने अवसर को हाथ से जाने दिया हो)।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
हितोपदेश के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

हितोपदेश के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें