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हितोपदेश • अध्याय 3 • श्लोक 59
करटको ब्रूते -- अथ तत्र गत्वा किं वक्ष्यति भवान् । स आह -- शृणु । किमनुरक्तो विरक्तो वा मयि स्वामीति ज्ञास्यामि तावत् । करटको ब्रूते -- किं तज्ज्ञानलक्षणम् । दमनको ब्रूते -- शृणु । दूराद् अवेक्षणं हासः संप्रश्नेष्वादरो भृशम् । परोक्षेऽपि गुणश्लाघा स्मरणं प्रियवस्तुषु ॥
करटक ने कहा - अब वहाँ जाकर क्या कहोगे? उन्होंने कहा - मेरी बात सुनो! सबसे पहले मैं यह पता लगाऊंगा कि मालिक मुझसे जुड़ा हुआ है या नहीं। करटक ने पूछा - वह कौन सा लक्षण है जिससे यह ज्ञात हो सके? दमनक ने उत्तर दिया - सुनो ! (किसी को) दूर से देखना, मुस्कुराना, किसी के कल्याण के बारे में पूछने का बहुत सम्मान करना, किसी की अनुपस्थिति में भी गुणों की प्रशंसा करना, किसी प्रिय वस्तु का स्मरण करना।
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