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हितोपदेश • अध्याय 3 • श्लोक 53
दमनको ब्रूते -- भद्र कथमहं सेवानभिज्ञः । पश्य । किमप्यस्ति स्वभावेन सुन्दरं वाप्यसुन्दरम् । यदेव रोचते यस्मै भवेत्तत्तस्य सुन्दरम् ॥
दमनक ने कहा - मित्र, मैं सेवा से अनभिज्ञ कैसे रह सकता हूँ? क्या प्रकृति में कोई चीज़ आकर्षक है या आकर्षक नहीं है? मनुष्य को जो कुछ भी अच्छा लगता है वही उसके लिए आकर्षक होता है।
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