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हितोपदेश • अध्याय 3 • श्लोक 50
आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषणेन च । नेत्रवक्त्रविकारेण लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥
मनुष्य के आंतरिक विचार उसकी विशेषताओं, हाव-भाव, चाल-ढाल, क्रिया-कलाप, वाणी और आँखों तथा चेहरे की गति से प्रकट होते हैं।
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