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हितोपदेश • अध्याय 3 • श्लोक 39
अन्यच्च । मनुष्यजातौ तुल्यायां भृत्यत्वमतिगर्हितम् । प्रथमो यो न तन्नापि स किं जीवत्सु गण्यते ॥
फिर जब मानव जाति सभी समान है, तो दास की स्थिति बहुत ही तुच्छ है। परन्तु क्या वह जीवितों में गिना जाएगा जो उस (सेवा) में भी प्रथम न हो?
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