पुनर्विचिन्त्य । केनायं राजा ममोपरि विकान्तितो न जाने । भेदमुपगताद्राज्ञः
सदा भेतव्यम् । यतः ।
मन्त्रिणा पृथिवीपालचित्तं विघटितं क्वचित् ।
वलयं स्फटिकस्येव को हि संधातुमीश्वरः ॥
(फिर से सोचते हुए) मैं नहीं जानता कि किसने इस राजा के मन में मेरे विरुद्ध जहर भर दिया है। जिस राजा की भावनाएँ विमुख हों, उससे मनुष्य को सदैव भयभीत रहना पड़ता है। क्योंकि, जब राजा का मन एक बार अपने मंत्री से विमुख हो जाता है, तो उसे कौन जोड़ सकता है, जैसे स्फटिक का कंगन टूट जाने पर?
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