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हितोपदेश • अध्याय 3 • श्लोक 140
तथा चोक्तम् -- गुणदोषावनिश्चित्य विधिर्न ग्रहनिग्रहे । स्वनाशाय यथा न्यस्तो दर्पात्सर्पमुखे करः ॥
इसी प्रकार कहा भी गया है - किसी के गुण-दोष का निश्चय किये बिना उपकार या दण्ड देना नीति नहीं है। (ऐसा आचरण) किसी के विनाश की ओर ले जाता है जैसे घमंड के कारण साँप के मुँह में डाला गया हाथ।
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