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हितोपदेश • अध्याय 3 • श्लोक 130
अन्यच्च । अप्रियाण्यपि कुर्वाणो यः प्रियः प्रिय एव सः । दग्धमन्दिरसारेऽपि कस्य वह्नावनादरः ॥
जो प्रिय है, वह अप्रिय कार्य भी करता है; जिसने घर का सारा सामान भस्म कर देने पर भी आग की उपेक्षा की (उससे कोई लेना-देना नहीं)?
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