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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 98
अन्यच्च । रहस्यभेदो याच्ञा च नैष्ठुर्यं चलचित्तता । क्रोधो निःसत्यता द्यूतमेतन्मित्रस्य दूषणम् ॥
गुप्त बात को फिर से प्रकट करना, भीख मांगना, कठोरता, मन की चंचलता, क्रोध, अविश्वास और जुआ - ये मित्र के दोष हैं।
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